पूणेमहाराष्ट्र

**‘अमृत से भी मधुर मराठी भाषा समृद्ध और संपन्न’

एमआईटी डब्ल्यूपीयू में आयोजित ‘मराठी भाषा और बोलियाँ’ परिसंवाद में वक्ताओं के विचार

**‘अमृत से भी मधुर मराठी भाषा समृद्ध और संपन्न’

एमआईटी डब्ल्यूपीयू में आयोजित ‘मराठी भाषा और बोलियाँ’ परिसंवाद में वक्ताओं के विचार**

पुणे, विशाल समाचार: 

“अमृत से भी मधुर मराठी भाषा अत्यंत समृद्ध और संपन्न है। बदलते समय में यदि हम शुद्ध मराठी की मानक भाषा और आत्मीय मातृबोली के बीच की दूरी कम कर सकें, तो मराठी भाषा को निश्चित रूप से बड़ा लाभ होगा।”

यह विचार एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी डब्ल्यूपीयू) में आयोजित ‘मराठी भाषा और बोलियाँ’ विषयक परिसंवाद में वक्ताओं ने व्यक्त किए।

मराठी भाषा संवर्धन पखवाड़े के अवसर पर महाराष्ट्र शासन के मराठी भाषा विभाग, महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोश निर्मिती मंडल तथा एमआईटी डब्ल्यूपीयू के स्कूल ऑफ एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में इस परिसंवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन एमआईटी डब्ल्यूपीयू के संस्थापक अध्यक्ष विश्वधर्मी प्रो. डॉ. विश्वनाथ कराड और कार्याध्यक्ष डॉ. राहुल कराड के मार्गदर्शन में किया गया।

विशेषज्ञों ने रखे विचार

ज्ञानेश्वर सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम में सुशील धसकटे, उद्धव धुमाले और धनंजय भावलेकर प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम में महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोश निर्मिती मंडल के सचिव डॉ. शामकांत देवरे, विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. आर. एम. चिटणीस भी मौजूद रहे। अध्यक्षता स्कूल ऑफ एजुकेशन की प्राचार्य डॉ. शालिनी टोपणे ने की।

सुशील धसकटे ने ‘भाषा, बोली और हम’ विषय पर बोलते हुए कहा कि ग्रामीण समाज ने मराठी भाषा और संस्कृति को जीवित रखा है। उन्होंने कहा कि बोली भाषाएँ भाषा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ले जाने का काम करती हैं, लेकिन आधुनिक दौर में विश्व की लगभग 50 प्रतिशत बोलियाँ समाप्ति की ओर बढ़ रही हैं। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक बताया।

 

 

उद्धव धुमाले ने ‘भाषा, बोली और समाचार पत्र’ विषय पर विचार रखते हुए कहा कि सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता कम होने के बाद प्रिंट मीडिया का भविष्य उज्ज्वल है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को शब्दों का सावधानीपूर्वक प्रयोग करना चाहिए और समाज व सत्ता से सवाल पूछना मीडिया का प्रमुख दायित्व है।

धनंजय भावलेकर ने ‘भाषा, बोली और सिनेमा’ विषय पर बोलते हुए कहा कि भाषा में शुद्ध और अशुद्ध का भेद नहीं होता। उन्होंने कहा कि सिनेमा ने भाषाई हीन भावना को दूर करने का कार्य किया है, लेकिन बढ़ते माइग्रेशन के कारण कई भाषाएँ और बोलियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने दैनिक जीवन में मराठी भाषा के अधिक उपयोग पर भी जोर दिया।

कार्यक्रम का स्वागत भाषण प्रो. प्रिया काले ने किया, जबकि संचालन डॉ. वंदना केंजळे ने किया

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