
पुणे के बानेर में चिन्मय विश्वविद्यापीठ द्वारा ‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ की शुरुआत
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे,… अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध पुणे शहर में शुक्रवार, 6 मार्च को बानेर में चिन्मय विश्वविद्यापीठ के ‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ की शुरुआत की गई। इस संस्थान का उद्घाटन चिन्मय मिशन के प्रमुख और चिन्मय विश्वविद्यापीठ के कुलाधिपति पूज्य स्वामी स्वरूपानंद के करकमलों से हुआ।
चिन्मय विश्वविद्यापीठ एक ऐसी विशिष्ट संस्था है जहाँ प्राचीन गुरु–शिष्य परंपरा को आधुनिक विश्वविद्यालय व्यवस्था के साथ समन्वित किया गया है। बानेर में आरंभ हुआ ‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ विद्यार्थियों को गुरुकुल परंपरा में भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने का अवसर देगा और साथ ही उन्हें मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त करने का भी मार्ग प्रदान करेगा।
इस अवसर पर पुणे स्थित ‘चिन्मय नाद बिंदु’ की निदेशक तथा ‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ की प्रमुख प्रमोदिनी राव ने कहा, “भारत अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा और दर्शन के लिए विश्वभर में जाना जाता है। अपनी जड़ों से जुड़ना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि खोजने की इच्छा हो तो अनुभव से मिलने वाले ज्ञान का विशाल भंडार हमारे पास है। स्वामी तेजोमयानंद के अनुसार संगीत का उद्देश्य कला, कलाकार और श्रोता—तीनों को एक ऊँचे स्तर तक ले जाना है। इसलिए संगीत शिक्षा केवल कौशल को निखारने तक सीमित न रहकर इस व्यापक उद्देश्य को भी ध्यान में रखनी चाहिए।”
‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (बीए ऑनर्स इन म्यूज़िक), दो वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम (एमए इन म्यूज़िक) तथा संगीत विषय में डॉक्टरेट (पीएचडी इन म्यूज़िक) की सुविधा उपलब्ध होगी। स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में हिंदुस्तानी गायन, बांसुरी और तबला में विशेष अध्ययन कराया जाएगा। वहीं पीएचडी कार्यक्रम में प्रस्तुति कला, शिक्षण पद्धति, संगीतशास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े उन्नत शोध पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
संस्थान में उपलब्ध सभी कार्यक्रमों में विद्यार्थियों को गहन, अनुभवाधारित और व्यक्तिगत मार्गदर्शन के साथ संगीत प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके साथ ही सुव्यवस्थित शैक्षणिक ढाँचा और शोध की दिशा में प्रोत्साहन इस शिक्षण पद्धति की विशेषता होगी।
‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी दो-स्तरीय शिक्षण व्यवस्था है, जिसमें गुरु और सहायक प्राध्यापक दोनों की भूमिका होती है। गुरु पारंपरिक और अनुभव-आधारित पद्धति से विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हैं, जबकि सहायक प्राध्यापक शैक्षणिक, सैद्धांतिक और शोध-आधारित अध्ययन को आगे बढ़ाने में सहयोग करते हैं। इस समन्वित पद्धति से विद्यार्थियों का समग्र विकास सुनिश्चित होता है—जिसमें गहन संगीत ज्ञान, नियमित रियाज़, सैद्धांतिक समझ और शोध क्षमता का संतुलित विकास होता है।
‘स्कूल ऑफ कलायोगा’ में संगीत को केवल एक विषय नहीं बल्कि साधना और जीवन शैली के रूप में देखा जाता है। इसलिए यहाँ विद्यार्थियों को संगीत समारोहों, बैठकों, उत्सवों और विद्वानों के साथ संवाद जैसे सांस्कृतिक अनुभवों से समृद्ध वातावरण में सीखने का अवसर मिलेगा।



