
अस्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र धारकों को योजनाओं में शामिल करने की मांग, अभिभावकों ने आजीवन देखभाल पर दिया जोर
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे, । अस्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र रखने वाले व्यक्तियों को सरकारी योजनाओं के दायरे में शामिल करने की मांग उठी है। शनिवार को आयोजित एक परामर्श बैठक में अभिभावकों, देखभालकर्ताओं और विशेषज्ञों ने कहा कि बौद्धिक दिव्यांगता और ऑटिज्म जैसी स्थितियों की जटिलता को देखते हुए ऐसे व्यक्तियों को योजनाओं से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
यह चर्चा नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल (NCPEDP) और ‘परिवार’ संस्था के संयुक्त तत्वावधान में हुई, जिसमें महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से जुड़े प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। बैठक में बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए राज्य समर्थित आवासीय देखभाल और दीर्घकालिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।
NCPEDP के कार्यकारी निदेशक अरमान अली ने कहा कि अस्थायी प्रमाणपत्र धारकों को योजनाओं से बाहर रखने से कई परिवारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रमाणपत्र की अवधि की परवाह किए बिना, पात्र व्यक्तियों को योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए, ताकि उन्हें बार-बार प्रमाण देने की प्रक्रिया से न गुजरना पड़े।
यह मुद्दा 27 मार्च 2026 को जारी एक सरकारी आदेश के संदर्भ में सामने आया, जिसमें केवल स्थायी दिव्यांगता प्रमाणपत्र रखने वाले व्यक्तियों को ही योजनाओं के लिए पात्र बताया गया है। बैठक में प्रतिभागियों ने कहा कि नीतियां बनाते समय दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की समावेशी भावना को ध्यान में रखना आवश्यक है।
चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने यह भी रेखांकित किया कि बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए माता-पिता या अभिभावकों के बाद देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। उन्होंने राज्य स्तर पर संरचित और समर्थित आवासीय व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
अभिभावक संगठनों ने आवासीय सुविधाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए सरकारी सहयोग बढ़ाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्ति परिवार के साथ, समूह आवास में या समुदाय के सहयोग से स्वतंत्र रूप से रहते हैं, और सभी स्थितियों में समर्थन आवश्यक है।
बैठक में महात्मा फुले आरोग्य योजना के विस्तार, विकास योजनाओं में आवासीय जरूरतों को शामिल करने, जमीन आवंटन, अंत्योदय योजना में दिव्यांग बच्चों को शामिल करने और परित्यक्त दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सहायता तंत्र विकसित करने जैसे सुझाव भी सामने आए। साथ ही देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर भी जोर दिया गया।
बैठक के अंत में प्रतिभागियों ने समन्वित प्रयासों के जरिए ऐसी नीतियां विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जो बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए दीर्घकालिक देखभाल, गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।



