
भोंदू महाराजों के चरणों में शिक्षितों का झुकना महाराष्ट्र का दुर्भाग्य
डॉ. श्रीपाल सबनीस की बेबाक भूमिका; प्रथम विश्वरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कार्यप्रेरणा पुरस्कार वितरित
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे : “छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित और शाहू-फुले-आंबेडकर के विचारों पर चलने वाले महाराष्ट्र में शिक्षित लोग और राजनेता भोंदू महाराजों के चरणों में लोटांगन करते हैं, यह महाराष्ट्र का दुर्भाग्य है। शिवाजी महाराज के इतिहास को तोड़-मरोड़कर समाज में वैमनस्य फैलाने वाली, अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली और महिलाओं का अपमान करने वाली प्रवृत्तियों को कुचलना चाहिए। छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा न्याय होना चाहिए,” ऐसी बेबाक भूमिका पूर्व साहित्य सम्मेलन अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. श्रीपाल सबनीस ने व्यक्त की।
स्नेहशील फाउंडेशन की ओर से आयोजित प्रथम विश्वरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कार्यप्रेरणा पुरस्कार वितरण समारोह में डॉ. सबनीस बोल रहे थे। इतिहास शोधकर्ता डॉ. श्रीमंत कोकाटे और सामाजिक चेतना से जुड़ी अभिनेत्री प्राजक्ता हनमघर को यह पुरस्कार प्रदान किया गया। इस अवसर पर लहुजी समता परिषद के अनिल हातागळे, ‘शिवाजी कौन था?’ के प्रकाशक प्रशांत आंबी और बालप्रबोधनकार स्वरा सुतकर का विशेष सम्मान भी किया गया। नवी पेठ स्थित पत्रकार भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ नेता उल्हासदादा पवार, पूर्व सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत देशमुख, रुग्ण हक्क परिषद के संस्थापक उमेश चव्हाण, ऑल इंडिया पैंथर सेना के दीपक केदार, संयोजिका एवं स्नेहशील फाउंडेशन की संस्थापक स्नेहा कांबळे-माने सहित अनेक मान्यवर उपस्थित थे।
डॉ. श्रीपाल सबनीस ने कहा, “शिवाजी महाराज का नाम लेने का अधिकार समाज और राजनेताओं दोनों ने खो दिया है। उनके इतिहास को तोड़-मरोड़कर समाज को गुमराह किया जा रहा है। बागेश्वर बाबा जैसे लोगों ने इतिहास विरोधी बयान दिए, लेकिन उस समय मंच पर बैठे नेताओं ने मौन क्यों साधा?” उन्होंने कहा कि छोटी बच्चियों पर अत्याचार समाज के नैतिक पतन का संकेत है। समाज और संस्कृति दोनों भ्रष्ट होती जा रही हैं। “निकम्मे समाज का प्रतिनिधित्व निकम्मे नेता कर रहे हैं। जब तक जनता जागरूक नहीं होगी, देश का भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता। इतिहास शोध, वैचारिक परंपरा और सत्य की खोज से ही समाज परिवर्तन संभव है,” उन्होंने कहा।
अभिनेत्री प्राजक्ता हनमघर ने कहा, “आज समाज एक भयावह मोड़ पर खड़ा है और हम इंसानियत तथा प्रेम की मूल भावनाओं को भूलते जा रहे हैं। आज बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ सिखाने की नौबत आ गई है, यह अत्यंत पीड़ादायक है। आने वाली पीढ़ी के लिए हम कैसा समाज बना रहे हैं, यह गंभीर प्रश्न है। कठोर कानून और उनका प्रभावी क्रियान्वयन ही ऐसी घटनाओं का समाधान है। अपराधियों के मन में कानून का भय होना जरूरी है। बुरा समय हमेशा नहीं रहता। यदि हम मतभेद भुलाकर प्रेम से एकजुट हों, तो समाज अधिक उज्ज्वल और खुशहाल बन सकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर पहला पुरस्कार मिलना उनके लिए गर्व के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है।
उमेश चव्हाण ने कहा, “समाज परिवर्तन की लड़ाई में सभी समाज घटकों को साथ लेना आवश्यक है। मराठा समाज को भी इस विचारधारा से जोड़कर व्यापक सामाजिक एकता का निर्माण होना चाहिए। आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं की आवाज अक्सर आक्रामक होती है, लेकिन शांति और संयम से भी उतनी ही मजबूती से विचार रखे जा सकते हैं, इसका उदाहरण यह कार्यक्रम है।”
उल्हासदादा पवार ने कहा, “जो कलाकार बेबाक भूमिका रखते हैं, उन्हें अधिक अवसर मिलने चाहिए। आज समझौता करने वालों को जल्दी अवसर मिलते हैं, लेकिन समाज परिवर्तन की आवाज उठाने वाले कलाकारों की उपेक्षा होती है। महापुरुषों की तुलना नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक महापुरुष अपने कार्यों से महान है। आकाश के तारों की तरह हर व्यक्ति अपनी अलग चमक रखता है।”
डॉ. लक्ष्मीकांत देशमुख ने कहा, “समाज में बढ़ती असहिष्णुता, अंधश्रद्धा और नैतिक पतन चिंताजनक है। समाज परिवर्तन के लिए विचारों और संवेदनशीलता को बचाए रखना बेहद जरूरी है। साहित्य, कला और संस्कृति केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि समाज जागरूकता के प्रभावी माध्यम हैं। लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए विवेक, संवाद और सामाजिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।”
डॉ. श्रीमंत कोकाटे ने कहा, “समाज में बढ़ते बाबा-बुवाओं के प्रभाव को रोकने के लिए व्यापक जनजागरण की जरूरत है। देश के हर जिले और हर घर तक अंधश्रद्धा फैल चुकी है। जब तक समाज में शत-प्रतिशत वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं होगी, तब तक बुवाबाजी खत्म नहीं होगी। निर्भय होकर विचार रखना हमारी जिम्मेदारी है।”
दीपक केदार ने कहा, “समाज के मूलभूत मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए जानबूझकर विवाद खड़े किए जा रहे हैं। आरक्षण, जातिवाद और मीडिया ट्रायल के माध्यम से असली मुद्दों को पीछे धकेला जा रहा है। आज इंसान के अस्तित्व की लड़ाई चल रही है। अपराधी की जाति नहीं, उसकी प्रवृत्ति महत्वपूर्ण है। ऐसी प्रवृत्तियों को समाज को मिलकर समाप्त करना होगा।”
कार्यक्रम में अनिल हातागळे, प्रशांत आंबी और स्वरा सुतकर ने भी अपने विचार व्यक्त किए। स्वागत एवं प्रस्तावना स्नेहा कांबळे-माने ने की। दीपक म्हस्के ने मंच संचालन किया और जीवराज चोले ने आभार व्यक्त किया।



