वृद्धाश्रम नहीं, संवेदनशील समाज की पहचान
भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों को देवतुल्य माना गया है। “मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” का संदेश केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधार रहा है। एक समय था जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग अनुभव, मार्गदर्शन और संस्कारों के केंद्र होते थे। परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी राय को प्राथमिकता दी जाती थी। लेकिन बदलते समय, शहरीकरण, रोजगार की मजबूरियों और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति ने सामाजिक ढांचे को बदल दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बुजुर्गों पर पड़ा है।
आज देश में लाखों बुजुर्ग ऐसे हैं जो अकेलेपन, बीमारी और उपेक्षा से जूझ रहे हैं। कई लोगों के बच्चे नहीं हैं, कई के बच्चे दूर शहरों या विदेशों में रहते हैं, जबकि कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें परिवार होते हुए भी अपेक्षित सहारा नहीं मिल पाता। ऐसे हालात में वृद्धाश्रम केवल एक भवन नहीं रह जाते, बल्कि उन लोगों के लिए आशा और सम्मान का केंद्र बन जाते हैं जिनके पास कोई विकल्प नहीं बचता।
राजकोट स्थित सदभावना वृद्धाश्रम की पहल इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण दिखाई देती है। हजारों बेसहारा, निःसंतान, दिव्यांग और गंभीर रूप से बीमार बुजुर्गों को निःशुल्क आश्रय, भोजन, चिकित्सा और देखभाल उपलब्ध कराने का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। विशेष रूप से बिस्तर पर पड़े, कोमा की स्थिति में जीवन बिता रहे या पूरी तरह दूसरों पर निर्भर लोगों के लिए ऐसी संस्थाएं जीवनरेखा साबित हो सकती हैं। समाज में अक्सर ऐसे लोग नजरअंदाज हो जाते हैं, जिनकी देखभाल करना कठिन होता है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी उठाना मानवीय सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण है।
हालांकि इस विषय का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या को केवल उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सामाजिक बदलाव का संकेत भी है। यदि हर बुजुर्ग को अपने परिवार में सम्मान, सुरक्षा और स्नेह मिले तो शायद वृद्धाश्रमों की आवश्यकता इतनी अधिक न हो। इसलिए समाज को यह आत्ममंथन भी करना होगा कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं जिनमें बुजुर्गों को परिवार से दूर आश्रय की तलाश करनी पड़ रही है।
सरकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पेंशन योजनाएं, कानूनी संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है। वहीं सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को भी बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में आगे आना होगा। केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि भावनात्मक सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके कमजोर और निर्भर वर्गों के प्रति व्यवहार से होती है। बच्चे और बुजुर्ग समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग हैं। यदि बुजुर्ग सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन व्यतीत कर सकें तो यह पूरे समाज की सफलता मानी जाएगी।
सदभावना वृद्धाश्रम जैसी पहलें यह विश्वास जगाती हैं कि आधुनिक दौर की भागदौड़ और स्वार्थ के बीच भी संवेदनाएं जीवित हैं। लेकिन अंतिम लक्ष्य ऐसा समाज होना चाहिए जहां हर बुजुर्ग को वृद्धाश्रम की नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रेम, सम्मान और संरक्षण की आवश्यकता पूरी हो सके। जब तक यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं होता, तब तक ऐसे संस्थान मानवता की सेवा के महत्वपूर्ण केंद्र बने रहेंगे।


