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दलित साहित्य आज भी समाज की जरूरत : वरिष्ठ साहित्यकार

दलित साहित्य आज भी समाज की जरूरत : वरिष्ठ साहित्यकार

उर्गेंन आर्ट फेस्टिवल’ के समापन समारोह में सामाजिक समानता और समरसता पर जोर

रिपोर्ट विशाल समाचार 

स्थान पुणे महाराष्ट्र 

पुणे: अस्पृश्यता, जातीय भेदभाव और इसके कारण इंसानों के बीच आज भी मौजूद असमानता के चलते दलित समाज का दुख और पीड़ा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। दलित साहित्य ने इन पीड़ाओं को आवाज देकर समाज के सामने वास्तविकता प्रस्तुत की है। जातीय भेदभाव खत्म कर सामाजिक समरसता और समानता स्थापित करने के लिए आज भी दलित साहित्य की जरूरत है। यह भावना वरिष्ठ साहित्यकारों और विचारकों ने व्यक्त की।

 

करुणादीप फाउंडेशन और त्रिरत्न वैरोचना सेंटर की ओर से बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित ‘उर्गेंन आर्ट फेस्टिवल’ के समापन अवसर पर कलाकार परिसंवाद का आयोजन किया गया। इसमें वरिष्ठ साहित्यकारों और विचारकों ने दलित साहित्य तथा कला के बीच संबंधों पर विचार व्यक्त किए।

 

परिसंवाद में पद्मश्री ग्नंवाग संपतेन, डॉ. विमलताई एस. थोरात, शाहीर संभाजी भगत और कवि नितीन चंदनशिवे ने सहभागिता की।

 

डॉ. विमल थोरात ने कहा कि महाराष्ट्र ने सबसे पहले दलित साहित्य को जन्म दिया और आज यह साहित्य पूरे देश में फैल चुका है। भारत की 22 भाषाओं में से करीब 20 भाषाओं में सक्रिय लेखक दलित समाज और उसके अनुभवों पर लिख रहे हैं। दलित साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होना जरूरी है। शब्दशः अनुवाद के बजाय उसकी भावनाओं और संवेदनाओं को दूसरी भाषाओं तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है, ताकि दलित समाज का दुख और संघर्ष व्यापक समाज तक पहुंच सके।

 

शाहीर संभाजी भगत ने कहा कि सत्ता के राजनीतिक संघर्ष से अलग एक सांस्कृतिक राजनीति भी मौजूद है। सत्ता की राजनीति कुछ समय के लिए होती है, जबकि सांस्कृतिक राजनीति का प्रभाव लंबे समय तक रहता है। दलितों के दुख और पीड़ा को सामने लाने के लिए एक समानांतर सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। समतावादी और मानवतावादी समाज के निर्माण के लिए दलित साहित्य को आवाज बनकर अन्याय और पीड़ा को समाज के सामने रखना चाहिए।

 

पद्मश्री ग्नंवाग संपतेन ने कहा कि तथागत गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सपनों के अनुरूप एकता, समानता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित समाज का निर्माण जरूरी है। इसमें दलित साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। देश यदि समानता की नींव पर मजबूती से खड़ा होता है, तभी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सपनों का भारत वास्तव में साकार होगा।

 

कवि नितीन चंदनशिवे ने कहा कि कविता के माध्यम से वंचित और उपेक्षित वर्गों के दुख और समस्याओं को सामने रखना वे अपने कवि के रूप में कर्तव्य मानते हैं। किसी कलाकार की कला और लेखक-कवि की कलम को वास्तविक महत्व तभी मिलता है, जब वह आम लोगों के दुख को समझकर उसे अपनी कला के माध्यम से समाज के सामने रखता है। कला या लेखन से तुरंत समस्या दूर न हो, लेकिन उस पीड़ा को निर्भीकता से सामने रखना जरूरी है। यह निर्भीकता प्रत्येक लेखक और कवि में होनी चाहिए।

 

कार्यक्रम का संचालन संतोष संखद ने किया। दिव्या शिंदे और डॉ. अस्मिता गायकवाड ने प्रस्तावना रखी, जबकि डॉ. वी. बी. गायकवाड ने आभार व्यक्त किया।

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