
सीजेपी का प्रस्तावित आंदोलन देश में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास: डॉ. हुलगेश चलवादी
आरपीआई (ए) प्रदेश उपाध्यक्ष ने आंदोलन के उद्देश्य और तरीके पर उठाए सवाल
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
पुणे, । चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर यदि किसी राजनीतिक दल या संगठन को आपत्ति है, तो संविधान में उसे अपनी बात रखने के लिए संसदीय, न्यायिक और कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। ऐसे में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की ओर से 2 अक्टूबर से देशव्यापी आंदोलन की घोषणा और सोनम वांगचुक द्वारा इसके समर्थन को लेकर आंदोलन के उद्देश्य और तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। यह आंदोलन देश में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास हो सकता है, ऐसी चिंता रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. हुलगेश चलवादी ने व्यक्त की।
डॉ. चलवादी ने कहा कि आरपीआई (ए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास आठवले ने सीजेपी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि पार्टी का उद्देश्य केवल इस्तीफा मांगना है, तो उसे अपना नाम बदलकर ‘राजीनामा जनता पार्टी’ कर लेना चाहिए। आठवले ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से किसी के दबाव में आकर इस्तीफा नहीं देने की अपील भी की है।
डॉ. चलवादी ने कहा कि चुनाव आयोग को लेकर किसी भी प्रकार की आपत्ति या आरोप हैं तो उन्हें तथ्यों और प्रमाणों के साथ संसद, न्यायालय अथवा संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष रखा जा सकता है। ऐसे में देशव्यापी आंदोलन के जरिए राजनीतिक तनाव पैदा करने की आवश्यकता पर सवाल उठता है। उन्होंने पूछा कि क्या सीजेपी को देश की संवैधानिक व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रियाओं पर विश्वास है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए गए सवालों पर आयोग की ओर से स्पष्टीकरण भी दिया गया है। यदि किसी के पास गंभीर आरोपों से जुड़े ठोस तथ्य हैं, तो संवैधानिक व्यवस्था के तहत उपलब्ध प्रक्रियाओं का सहारा लिया जा सकता है। ऐसे में सड़कों पर संघर्ष की स्थिति पैदा करने का आग्रह कितना उचित है, इस पर विचार किया जाना चाहिए।
डॉ. चलवादी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आरोपों की पुष्टि के लिए तथ्य और प्रमाण सामने रखना भी जरूरी है। आंदोलन के माध्यम से संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का वातावरण बनाना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करने का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके साथ संस्थागत प्रक्रियाओं का सम्मान भी आवश्यक है। लोकतंत्र को मजबूत करने के नाम पर देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में अस्थिरता पैदा न हो, इसकी जिम्मेदारी आंदोलन करने वालों को भी समझनी चाहिए।


