शायद इसीलिए कभी-कभी मनोज कुमार कहते भी थे कि देशभक्ति थोपी नहीं जानी चाहिए।
दरअसल, भारतीय नागरिकों में जिस तरह की देशभक्ति वे देखना चाहते थे, उसे उन्होंने बखूबी अभिव्यक्त किया और पूरब से लेकर पश्चिम तक उन्होंने भारत की ही बात सुनाई। इस तरह एक कलाकार के रूप में राष्ट्रीय चेतना की नींव मजबूत की और देशभक्ति की धारा बहाई। उनकी फिल्म ‘शहीद’ को कौन भूल सकता है। मनोज कुमार जब भगत सिंह की मां से मिले, तो उन्होंने कहा था कि तुम मेरे बेटे जैसे लगते हो।
मनोज कुमार की फिल्मों में देशभक्ति की भावना व्यापक थी। वह एक राष्ट्र तक सीमित नहीं थी। उसमें करोड़ों नागरिकों के दुख-सुख और उनकी भावनाएं भी जुड़ी थीं। ‘उपकार’ और ‘पूरब पश्चिम’, फिर ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों ने न केवल भारतीयों को भी झकझोर कर रख दिया था निश्चित रूप से उनकी फिल्मों में लादी गई देशभक्ति नहीं थी। न ही मनोज कुमार उनके जरिए अपना कोई विचार या दृष्टिकोण किसी पर थोप रहे थे।
देशवासियों, बल्कि विदेश में रहने वाले प्रवासी

