
बालभारती की ओर से आयोजित पाठ्यपुस्तक निर्माण उद्बोधन कार्यशाला का उद्घाटन शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे के हाथों
विद्यार्थी जीवन में सफलता के साथ संस्कृति से जुड़ा रहे, इसी दृष्टि से पाठ्यपुस्तकों का निर्माण होना चाहिए – दादाजी भुसे
पुणे : विद्यार्थी जीवन में सफल, स्वावलंबी और अपने पैरों पर खड़ा होने के साथ-साथ अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ा रहे, इस दृष्टि से पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करने के लिए बालभारती को प्रयास करना चाहिए, ऐसे निर्देश स्कूल शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे ने दिए। उन्होंने यह भी अपेक्षा जताई कि नई शिक्षा नीति पर आधारित शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी भारतीय राष्ट्रीय विचारों वाला बने।
महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं पाठ्यक्रम अनुसंधान मंडल (बालभारती) की ओर से शिवछत्रपति क्रीड़ा संकुल, बालेवाड़ी में आयोजित पाठ्यपुस्तक निर्माण उद्बोधन कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वे बोल रहे थे। इस मौके पर स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव रणजीत सिंह देओल, शिक्षा आयुक्त सचिंद्र प्रताप सिंह, महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के निदेशक राहुल रेखावर, पाठ्यपुस्तक निर्माण सुकाणू समिति सदस्य श्रीपाद ढेकणे, शिक्षा निदेशक कृष्णकुमार पाटील, महेश पालकर, शरद गोसावी, पाठ्यपुस्तक निर्माण एवं पाठ्यक्रम अनुसंधान मंडल की निदेशक अनुराधा ओक आदि उपस्थित थे।
भुसे ने कहा कि बालभारती के कारण महाराष्ट्र की शिक्षा पद्धति को पूरे देश में आकर्षण के रूप में देखा जाता है। आज मोबाइल, टीवी, ई-माध्यम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे साधन बच्चों का ध्यान भटका रहे हैं। ऐसे में बालभारती को चाहिए कि वह पढ़ने योग्य आकर्षक और आधुनिक पुस्तकें तैयार करे। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की लड़ाइयों के साथ-साथ उनके राज्यकारभार और अन्य कौशलपूर्ण गुणों को भी पाठ्यपुस्तकों में स्थान मिलना चाहिए। साथ ही, अहिल्याबाई होळकर, सावित्रीबाई फुले, महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जैसी विभूतियों को भी मान का स्थान पाठ्यपुस्तकों में मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल शिक्षा में सैन्य प्रशिक्षण शामिल करने का निर्णय लिया गया है, ताकि भारत का संस्कारक्षम नागरिक तैयार हो। कृषि, पर्यावरण, परिवहन नियम, सामाजिक समस्या, नशामुक्ति जैसे विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं, इतिहास विषय के शिक्षक स्थानीय स्तर पर पाठ्यक्रम बनाते समय अपने जिले और क्षेत्र के समाज सुधारकों, संतों व प्रमुख व्यक्तियों का समावेश करें, इस पर भी ध्यान देने को कहा।
प्रधान सचिव रणजीत सिंह देओल ने कहा कि इस कार्यशाला में एनसीईआरटी की पुस्तकें बनाने वाले तज्ज्ञ मार्गदर्शन करेंगे। बच्चों को मोबाइल से पढ़ाई और पुस्तकों की ओर आकर्षित करना जरूरी है, इसलिए पुस्तकें ऐसी हों जो मोबाइल से भी अधिक रोचक हों। पुस्तकों में समयानुकूल नई बातें और मूल्य शामिल होने चाहिए।
शिक्षा आयुक्त सचिंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि कोई पुस्तक उत्कृष्ट है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे उसे पसंद करते हैं या नहीं। बच्चों का ध्यान आकर्षित करने के लिए सृजनशीलता, नवीनता और कल्पनाशीलता जरूरी है। अगले एक वर्ष में दूसरी, तीसरी, चौथी और छठी कक्षा की नई पुस्तकें तैयार कर बच्चों तक पहुंचाई जाएंगी।
निदेशक राहुल रेखावर ने कहा कि आने वाली पीढ़ी की मजबूत नींव के लिए उत्कृष्ट पाठ्यपुस्तकें बनाना ही इस कार्यशाला का उद्देश्य है। इसमें देशभर के शिक्षाविद, एनसीईआरटी के विभिन्न विभाग प्रमुख और विषय विशेषज्ञ मार्गदर्शन देंगे।
इस अवसर पर 2025-26 की शैक्षणिक दैनंदिनी का प्रकाशन भी किया गया।
दो दिवसीय इस कार्यशाला में शिक्षा क्षेत्र के तज्ज्ञ, पाठ्यपुस्तक निर्माण विशेषज्ञ, राज्यभर से आए विषय शिक्षक, शिक्षा विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।


