इटावा में प्रशासन पर बड़ा सवाल!
दो महीने तक अधिकारी गायब — जांच बिना ही शिकायत ‘निस्तारित’
शिकायतकर्ता रोज़ बैठा रहा कार्यालय में, अफसरों ने मुँह तक नहीं दिखाया**
इटावा विशाल समाचार: जनपद इटावा में समाधान पोर्टल की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। एक शिकायतकर्ता पूरे दो महीने तक अपने उप-विभागीय कार्यालय में बैठा रहा, ताकि अधिकारी किसी भी समय आकर जांच कर सकें, लेकिन न कोई फोन आया, न नोटिस, न पूछताछ — और सबसे चौंकाने वाली बात यह कि बिना किसी जांच के शिकायत को “निस्तारित” दिखा दिया गया।
जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता ने 27 सितंबर 2025 को समाधान पोर्टल पर शिकायत संख्या 12161250193619 दर्ज की थी। इसके बाद वह लगातार उप-विभागीय कार्यालय में मौजूद रहा, ताकि प्रशासन चाहे जब भी जांच करना चाहे, वह उपलब्ध रहे। लेकिन—
❗ दो महीने में एक भी अधिकारी नहीं पहुंचा
— न कोई तहसील का कर्मचारी
— न कोई जांच अधिकारी
— न कोई फोन कॉल
— न कोई सत्यापन
फिर भी पोर्टल पर मामला “निपटाया” दिखा दिया गया।
शिकायतकर्ता का कहना है—
> “मैं रोज़ाना विभागीय कार्यालय में बैठा रहा। दो महीने तक इंतजार किया। किसी अधिकारी ने पूछने तक की ज़रूरत नहीं समझी। फिर कैसे निस्तारित हुआ? जांच कहां हुई?”
फीडबैक भी गायब—प्रशासन मौन
11 अक्टूबर को दिया गया फीडबैक भी पूरी तरह अनदेखा छोड़ दिया गया।
फीडबैक पढ़ने तक की कोशिश न करना प्रशासनिक उदासीनता की पोल खोल रहा है।
सेवानिवृत्त होने वाला अधिकारी जांच से बच रहा?
शिकायतकर्ता ने दावा किया कि जिस अधिकारी के पास जांच थी, उनका रिटायरमेंट निकट है, इसलिए उन्होंने जांच को जानबूझकर टाल दिया।
इस पर प्रशासनिक हलकों में कड़ी चर्चा है।
बिना जांच निस्तारण: जनसुनवाई की विश्वसनीयता पर भारी धक्का
बिना स्थल जांच, बिना बयान, बिना दस्तावेज़, बिना संपर्क के शिकायत को “निस्तारित” करना न सिर्फ नियमविरुद्ध है, बल्कि समाधान पोर्टल की साख पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस सप्ताह DM इटावा को सौंपा जाएगा कड़ा पत्र
शिकायतकर्ता अब पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण, प्रमाण, और दो महीने की वास्तविक उपस्थिति को लेकर जिलाधिकारी इटावा को लिखित शिकायत सौंपने जा रहा है।
मुख्य मांगें होंगी—
उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच
गलत निस्तारण पर जिम्मेदारी तय
रिटायरमेंट का हवाला देकर मामले को दबाने वालों पर कार्रवाई
लोगों में आक्रोश: “जब कार्यालय में बैठा व्यक्ति भी न्याय न पा सके तो…!”
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर दो महीने तक रोज़ दफ्तर में बैठने वाला शिकायतकर्ता भी जांच
से वंचित रह सकता है, तो फिर आम जनता का क्या होगा?



