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गायन, वादन और नृत्य का ‘सवाई’ के स्वरमंच पर त्रिवेणी संगम

गायन, वादन और नृत्य का ‘सवाई’ के स्वरमंच पर त्रिवेणी संगम

मेघरंजनी मेधी की मन मोह लेने वाली कथक नृत्य प्रस्तुति

पुणे,  : कंठसंगीत, वाद्यसंगीत और नृत्य—इन तीनों कलाओं का अद्भुत संगम शनिवार को सवाई के स्वरमंच पर रसिकों ने अनुभव किया। इस त्रिवेणी संगम ने ‘गीतं वाद्यं तथा नृत्यं, त्रयं संगीतमुच्यते’ इस सूक्ति का सजीव अनुभव कराया।

 

सवाई के चौथे सत्र के उत्तरार्ध की शुरुआत प्रसिद्ध गायक डॉ. भरत बलवल्ली के गायन से हुई। उन्हें वरिष्ठ गायक व गुरु पं. यशवंतबुवा जोशी से ग्वालियर घराने की तालीम मिली है। उन्होंने राग शहाना कानड़ा की प्रस्तुति की। ‘मोरे आये कुवर कन्हाई…’ झपताल की रचना को विस्तार से प्रस्तुत किया। इसके बाद ‘मंदिरवा मै मोरे आज…’ द्रुत एकताल में सुनाते हुए उन्होंने दमदार दमसास और तैयार तानों का सुंदर प्रदर्शन किया।

 

इसके उपरांत राग शंकर में स्वरराज छोटा गंधर्व की ‘प्रथम नाद पहचानो…’ त्रिताल की रचना पेश की। रात्रि राग को प्रभावी ढंग से रंगने में वे सफल रहे। संगीत मानापमान नाटक का ‘युवतिमना दारुण रण रुचिर प्रेमसे…’ हंसध्वनि राग में द्रुत एकताल का नाट्यगीत उन्होंने अत्यंत आक्रामक शैली में प्रस्तुत किया। अंत में ‘हरी म्हणा कुणी गोविंद म्हणा…’ इस भक्तिरसपूर्ण रचना से उन्होंने गायन का समापन किया। उन्हें रामकृष्ण करंबेळकर (तबला), मिलिंद कुलकर्णी (हार्मोनियम), गंभीर महाराज (पखावज), दिगंबर जाधव और मुबिन मिरजकर ने संगत दी।

 

रात गहराने के साथ सवाई का उत्तरार्ध और भी रंगतदार हुआ। विदुषी कला रामनाथ के वायलिन और डॉ. जयंती कुमरेश की सरस्वती वीणा—इन दोनों के संयुक्त स्वरसंयोग ने राग चारुकेशी को जीवंत कर दिया। आलाप, जोड़ और झाला के माध्यम से राग विस्तार पाता गया। उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संगीत परंपराओं का सुंदर संगम इसमें स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। दोनों कलाकारों का वाद्यों पर अद्भुत अधिकार और मिंड कार्य की खूब सराहना हुई। इनके साथ वरिष्ठ तबलावादक पं. योगेश समसी और जयचंद्र राव (पखावज) के सवाल-जवाब ने श्रोताओं को विशेष आनंद दिया। तानपुरा संगत कबीर शिरपूरकर और सावनी जोशी ने की।

 

आसाम की प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना मेघरंजनी मेधी की प्रस्तुति अंतिम सत्र का मुख्य आकर्षण रही। उनके सशक्त पदन्यास, सधी हुई देहबोली और भावपूर्ण अभिनय ने रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने देवी स्तुति से नृत्य का प्रारंभ किया, जिसमें देवी के सौम्य, उग्र, दैत्यनाशिनी, असुरसंहारिणी और युद्धसन्नद्ध रूपों के साथ-साथ मंगल और शांत स्वरूप को भी उन्होंने प्रभावशाली ढंग से साकार किया।

 

इसके बाद कथक के लखनऊ घराने का प्रतिनिधित्व करते हुए थाट, आमद, परण, टुकड़े, चक्रधार और चक्कर उन्होंने विलंबित, मध्य और द्रुत लय में प्रस्तुत किए। कथक के भावपक्ष को रेखांकित करती कृष्णलीला भी उन्होंने बखूबी साकार की।

 

रसिकों से संवाद करते हुए मेघरंजनी ने कहा, “सवाई केवल एक स्वरमंच नहीं, बल्कि मेरे लिए यह एक स्वरमंदिर है। यहां प्रस्तुति देने का सपना हर कलाकार देखता है और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। आज यहां नृत्य प्रस्तुति का अवसर मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानती हूं।”

 

कृष्णलीला की प्रस्तुति में ‘मैया मोरी मै नहीं माखन खायो…’ इस लोकप्रिय रचना के माध्यम से उन्होंने आकर्षक देहबोली, संवेदनशील और सशक्त अभिनय, रसाभिव्यक्ति, पदलालित्य और मुद्राभिनय का मनोहर प्रदर्शन किया। उन्हें पं. जयप्रकाश मेधी (गायन व लेहरा), पार्थ भूमकर (पखावज), उस्ताद फारुख लतीफ खान (सारंगी), गुरु मारमी मेधी (बोल पढ़ंत), अमान अली खान (तबला) और निलंभ दास (व्यवस्थापन) ने उत्कृष्ट संगत प्रदान की। महोत्सव का सूत्रसंचालन आनंद देशमुख ने किया।

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