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21वीं सदी में भी जारी युद्ध बेहद दुर्भाग्यपूर्ण: रामदास आठवले

21वीं सदी में भी जारी युद्ध बेहद दुर्भाग्यपूर्ण: रामदास आठवले

रिपोर्ट :विशाल समाचार

स्थान:पुणे महाराष्ट्र

पुणे :दुनियाभर में बढ़ती युद्धग्रस्त परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि 21वीं सदी में भी युद्धों का जारी रहना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी का “युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए” संदेश आज पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक है।

यह वक्तव्य पद्मपाणी फाउंडेशन और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के पाली एवं बौद्ध अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दूसरे पाली साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर दिया गया। कार्यक्रम में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पाली विभाग प्रमुख प्रो. डॉ. बिमलेन्द्र कुमार, गगन मलिक, भदंत हर्षबोधि महाथेरो, डॉ. योजना भगत, उपमहापौर परशुराम वाडेकर सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

आठवले ने कहा कि पाली भाषा ने विश्व को ज्ञान, विज्ञानवाद, समानता, मानवता और शांति का संदेश दिया है। बौद्ध दर्शन के माध्यम से यह ज्ञान पूरी दुनिया तक पहुंचा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि पाली भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सरकार हर संभव मदद करेगी और इसे और अधिक व्यापक स्तर पर फैलाने के प्रयास किए जाएंगे।

सम्मेलनाध्यक्ष डॉ. बिमलेन्द्र कुमार ने कहा कि पाली भाषा में गौतम बुद्ध के विचारों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर समृद्ध साहित्य उपलब्ध है। उन्होंने मांग की कि पाली भाषा के संवर्धन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय या संस्थान की स्थापना की जाए और महाविद्यालयों में रिक्त पड़े प्राध्यापकों के पद जल्द भरे जाएं।

कार्यक्रम में गगन मलिक ने चिंता जताई कि वर्तमान समय में बौद्ध धर्म और पाली भाषा दोनों ही संकट में हैं। उन्होंने युवाओं से भिक्षु बनने और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में योगदान देने की अपील की, साथ ही थाईलैंड में प्रशिक्षण की जिम्मेदारी लेने की बात भी कही।

भदंत हर्षबोधि महाथेरो ने कहा कि पाली भाषा लोगों को जोड़ने वाली, मैत्री और परिवर्तन की भाषा है। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और गौतम बुद्ध के विचारों के व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम में पाली भाषा के प्रचार-प्रसार को लेकर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे और इसे शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से शामिल करने की मांग की। साथ ही पाली साहित्य को विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवादित करने की आवश्यकता भी व्यक्त की गई।

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