जनसुनवाई में खानापूरी – इटावा के वन विभाग की कारगुज़ारी ने खोला भ्रष्टाचार का काला चेहरा
कानपुर /इटावा विशाल समाचार मुख्य संवाददाता,
योगी सरकार भ्रष्टाचार पर नकेल कसने और सुशासन की दुहाई देती है। “जनसुनवाई पोर्टल” को जनता की आवाज़ सुनने का सबसे बड़ा मंच बताया जाता है। लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि यह व्यवस्था भी भ्रष्ट अधिकारियों के लिए ढाल बन चुकी है।
मरवाही (छत्तीसगढ़) में हाल ही में ग्रीन क्रेडिट योजना की गड़बड़ियों पर रेंजर को तुरंत निलंबित कर दिया गया। छोटे पौधे लगाने और अधूरे रोपण पर अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन यूपी के इटावा–कानपुर मंडल में मामला बिल्कुल उलटा है। यहां अधिकारियों ने भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए कॉपी-पेस्ट रिपोर्ट लगाकर खानापूरी पूरी कर दी।
शिकायत थी गड़बड़ी की, मिली सिर्फ़ खानापूरी
शिकायतकर्ता शिवाय राजपूत ने शिकायत संख्या 12000250136728 दर्ज कराई थी। आरोप था कि सामाजिक वानिकी प्रभाग, इटावा में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ है।
आदेश हुआ कि जांच हो।
31 जुलाई 2025 को प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग, इटावा ने एक रिपोर्ट लगा दी।
•महज़ 8 अगस्त को मुख्य वन संरक्षक, कानपुर मंडल ने वही रिपोर्ट हूबहू कॉपी-पेस्ट कर दी।
न कोई मौके पर जांच, न गवाहों के बयान, न साक्ष्य — सिर्फ़ औपचारिकता। फोन पर कुछ बातें, कागज़ पर खानापूरी, और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का क्लीनचिट पैकेज।
भ्रष्टाचारियों को बचाने की सुनियोजित योजना
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस पूरे खेल में डीएफओ, क्षेत्राधिकारी, डिप्टी रेंजर और वन रक्षक तक को बचाने की सुनियोजित योजना बनाई गई।
•विभाग ने ईमानदारी से जांच करने की बजाय आरोपी अधिकारियों को बचाने में रुचि दिखाई।
•घोटाले की गंध इतनी तीखी थी कि अगर निष्पक्ष जांच होती तो बड़े-बड़े अफसर कटघरे में खड़े होते।
जनता पूछ रही है — क्या यही सुशासन है? क्या यही “भ्रष्टाचार पर नकेल कसने” का दावा है कि आरोपी अधिकारियों को मलाई खिलाई जाए और रिपोर्ट में उन्हें दूध से धुला दिखा दिया जाए?
जनसुनवाई पोर्टल बना मज़ाक
सरकार जिस “जनसुनवाई पोर्टल” को जनता की ताकत कहती है, वही अब मज़ाक बनकर रह गया है।
•भ्रष्टाचार की शिकायत करो, पर जांच के नाम पर वही रिपोर्ट कॉपी करके ऊपर भेज दी जाती है।
•जनता को उम्मीद रहती है कि उनकी आवाज़ मुख्यमंत्री तक पहुंचेगी, पर असलियत यह है कि रिपोर्ट मक्खन-मलाई लगाकर आरोपियों के पक्ष में ही भेज दी जाती है।
•जनता अब यह कहने लगी है कि — “जनसुनवाई पोर्टल में न्याय नहीं, सिर्फ़ खानापूरी होती है।”
मरवाही बनाम इटावा – दोहरा रवैया
तुलना कीजिए —
मरवाही (छत्तीसगढ़): छोटे पौधे लगाने और अधूरे रोपण पर रेंजर निलंबित।
इटावा (उत्तर प्रदेश): शिकायत पर कॉपी-पेस्ट रिपोर्ट बनाकर भ्रष्टाचारियों को क्लीनचिट।
यानी वन विभाग का रवैया दोहरा है। छत्तीसगढ़ में कार्रवाई, और यूपी में बचाव। आखिर क्यों? क्या यूपी में अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है?
सरकार की साख पर आंच:•यह मामला योगी सरकार की साख पर सीधा हमला है।
•सरकार दावा करती है कि “भ्रष्टाचार मुक्त शासन” दे रही है।
•लेकिन विभागीय अधिकारी शिकायतों को कूड़ेदान में डालकर भ्रष्टाचारियों को बचा रहे हैं।
अगर यही हाल रहा, तो जनता का विश्वास सरकार से पूरी तरह टूट जाएगा
जनता की मांग: जनता अब खुलकर सवाल कर रही है और मांग रख रही है:
1. तुरंत उच्च स्तरीय जांच हो।
2. कॉपी-पेस्ट रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
3. डीएफओ, क्षेत्राधिकारी, डिप्टी रेंजर और वन रक्षक की भूमिका उजागर हो और उन्हें जवाबदेह बनाया जाए।
4. जनसुनवाई पोर्टल की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह हो।
तेज सवाल विशाल समाचार का
•मरवाही में निलंबन होता है तो इटावा में क्यों नहीं?
•क्या यूपी के अधिकारी भ्रष्टाचारियों के संरक्षक बन गए हैं?
•जनता की शिकायतें सिर्फ़ फाइलों की खानापूरी तक ही सीमित क्यों हैं?
•क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने ही अफसर गुमराह कर रहे हैं?
निष्कर्ष: जनसुनवाई जैसी व्यवस्था, जो जनता की उम्मीदों का सहारा थी, अब भ्रष्टाचारियों की ढाल बन गई है। अगर सरकार ने सख़्त कदम नहीं उठाए तो “भ्रष्टाचार मुक्त
शासन” का नारा सिर्फ़ खोखला साबित होगा।
जनता की आवाज़ साफ़ है — “जनसुनवाई में न्याय नहीं, सिर्फ़ खानापूरी हो रही है।”
संपादकीय टीम विशाल समाचार

